एक सूक्ष्म परिचय

अखिलकोटि ब्रह्माण्डनायक परब्रह्मम्, लीलापुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण की परम पावन क्रीड़ास्थली श्रीधामवृन्दावन में, सतत् निवास करने वाले आध्यात्मिक जगत के देदीप्यमान सूर्य की भाँति जन-जन के मानस पटलपर छाये प.पू. भागवत-भूषण पं. श्रीनाथ शास्त्री पुराणाचार्य जी के यशस्वी सुपौत्र व शिष्य, परम गौ सेवाव्रती डॉ. श्रीकृष्णकुमारजी शर्मा जी के चिरंजीव तथा वात्सल्य की प्रतिमूर्ति प्रभुमाँ (नानीजी) की गोद में “कन्हैया” व प.पू.ब्रह्मालीन स्वामी श्रीअखण्डानन्द सरस्वती जी महाराज द्वारा “प्रणव” नामकरण का सौभाग्य प्राप्त, भागवतकिङ्कर श्रीअनुरागकृष्ण शास्त्री “श्रीकन्हैयाजी” श्रीमद्भागवत कथा क्षेत्र के देदीप्यमान नक्षत्र हैं ।

धर्मो मद्भक्तिकृत् प्रोक्तो ज्ञानं चैकात्म्यदर्शनम् ।
गुणेष्वसङ्गो वैराग्यमैश्वर्यं चाणिमादय: ।।

(श्रीमद्भागवत ११/१९/२७ )

dharmo madbhaktikṛt prokto jñānahak caikātmyadarśanam ।
gueśvasaṅgo vairāgyamaiṃvaryaṇ cāāimādaya: ।।

(śrīmadbhāgavata 11/19/27 )

https://www.vaidikyatra.org/wp-content/uploads/2019/04/Guruji_Hindi_img-1.png

आपका जन्म वसन्त पचंमी के अगले दिन षष्ठी को १०/०२/१९८१ को मातुलगृह राजनांदगाँव में हुआ । आपसे बड़ी एक बहन है, जो कोलकाता में सपरिवार रहती है । एक छोटी बहन, जो अपने श्वसुरालय जयपुर में रहती हैं । आपकी बाल्यावस्था सामान्य बच्चों की अपेक्षा अधिक चंचलता से ओतप्रोत थी । शायद नटखट कन्हैया की छाया पड़ी थी । इसीलिए आज भी आत्मीयगण आपको “कन्हैया”नाम से ही पुकारते हैं ।

आपकी प्रारम्भिक व माध्यमिक शिक्षा मथुरा, वृन्दावन से हुई तथा स्नातक में आपने बी.बी.ए. आगरा विश्वविद्यालय से किया ।

दिल्ली से टॉफिल की शिक्षा प्राप्त कर आपने कॅम्ब्रिज विश्वविद्यालय से एम.बी.ए की शिक्षा ग्रहण की, परन्तु; पूज्य श्रीदादागुरुजी की आज्ञा से उसे मध्य में ही छोड़कर अपना सर्वस्व जीवन, पूर्णरुपेण भागवत-भगवान् को ही समर्पित कर दिया । स्नातकोत्तर की शिक्षा पूर्ण न हो पाने के कारण आपको कुछ अधूरापन लगने लगा । अतः आपने आगरा विश्वविद्यालय से पी.जी.डी.सी.ए. एवं ऑफिस मैनेजमेंट का कोर्स प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण किया । साथ ही काशी सम्पूर्णानन्द विश्वविद्यालय से शास्त्री की परीक्षा भी प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की ।

प्रबन्घन की उच्च शिक्षा से सुसज्जित आपने अपनी सनातन संस्कृति की धरोहर गूढ़ दर्शन-शास्त्र, श्रीमद्भागवत का अनुशीलन तथा संस्कृत अध्ययन को ही अपने जीवन का पाथेय बना लिया । सूट-बूट एवं टाई की जगह धोती-कुर्ता ने ले ली। आप मनोयोग से श्रीमद्भागवत तथा संस्कृत भाषा के अध्ययन में डूब गये तथा “मनस्वी कार्यार्थी न गणयति दुःखं न च सुखम्” की सूक्ति चरितार्थ हुई ।

Vaidik Yatra

रामायण, श्रीमद्भागवद्गीता, उपनिषद्, ब्रह्मसूत्र आदि पर अध्ययन करते हुए श्रीदादागुरुजी का आपको पग-पग पर दिशा निर्देश मिलता रहा । अर्थ तथा गूढ़ रहस्य समझने के लिए विद्वानों, सन्तों की कमी नहीं थी । श्रीदादागुरुजी रूपी ज्ञान-गङ्गा स्वयं घर में ही बह रही थी । आवश्यकता थी तो केवल लगन, निष्ठा एवं परिश्रम की । तो आपने कुछ ही वर्षो में निर्मल ज्ञानरुपी गङ्गाजल से अपने जीवन को भिगो लिया । अब इसे निखारना, तराशना तथा अनुभव की कसौटी पर परीक्षण करना था । ये कार्य आप अब भी निरन्तर कर रहे हैं । आपकी आज भी यही विचार धारा है कि – “स्वाध्यायान्मा प्रमद”

संवत् २०६१ चैत्र नवरात्र में मौन उपवास के साथ श्री गिरिराज- गोवर्धनकी तलहटी में उन्हीं के निःस्पृह स्वरूप सन्त पं. श्री गयाप्रसादजी महाराज के आध्यात्मिक विग्रह के समक्ष श्रीमद्भागवत महापुराण का संस्कृत वाचन कर परमपूज्य श्रीरामदासजी “काकाजी” की सन्निधि में आध्यात्मिक ऊर्जा प्राप्त कर, तथा तदुपरान्त ०८ अगस्त २००४ से प.पू. कार्ष्णि स्वामी श्रीगुरुशरणानन्दजी महाराज के शुभाशीष की छाया में अष्टोत्तरशत (१०८) श्रीमद्भागवत महापुराण के भव्य आयोजन द्वारा कथा यात्रा आरम्भ की । स्वयं स्वामीपाद ने कहा कि लगता ही नहीं कि यह प्रथम कथा-वाचन है । तदनन्तर श्रीदादागुरुजी की आज्ञानुसार वृन्दावन के सन्त श्रीहरिबाबा के बांध धाम तीर्थ पर तथा परम पूज्या आनन्दमयी माँ की आध्यात्मिक स्थली कन्खल आश्रम में मैत्री दीदी के समक्ष वाणी पुष्प के माध्यम से श्रीमद्भागवत कथा समर्पित की । सन २००५ में “भागवत सेवा संस्था” के नाम से एक न्यास का गठन किया । जिसके अन्तर्गत शिक्षा के क्षेत्रमें सन् १९६४ से चल रहे “श्रीमद्भागवत विद्यालय” का संचालन करना स्वीकारा किया । साथ ही “वैदिक यात्रा गुरुकुल” के नाम से वेद, वेदाङ्गो कर्मकाण्ड, ज्योतिष, व्याकरण, दर्शन, संगीत आङ्गालभाषा व कम्पूटर आदि की सप्तवर्षीय शिक्षा आरम्भ की ।

Vaidik Yatra

आपका भाव-समुद्र व कथा शैली हृदयस्पर्शी है, जिनमें करुणा का प्रवाह है । शब्दाडम्बर नहीं है । आपकी कथा में श्रोता ही गद्गद् होकर नहीं रोते, बल्कि; वक्ता स्वयं भाव-विभोर होकर अश्रु प्रवाह से आप्लावित हो जाते हैं । कथा-वाचन के समय आपकी दशा देखकर सन्त प्रवर डोंगरे जी महाराज की स्मृति जागृत हो जाती है । कभी स्व.श्री हरिवंश राय बच्चन जी की कविताओं या मैथिलीशरण गुप्त जी की गम्भीर पंक्तियों के माध्यम से अथवा सरल उदाहरणों के द्वारा कठिन से कठिन शास्त्रों के भाव को बड़ी सरलता से प्रत्येक श्रोता के हृदयपटल तक पहुंँचा देते हैं ।

भागवतकिङ्कर श्रीअनुरागकृष्ण शास्त्री “श्रीकन्हैयाजी” यात्रा

Vaidik Yatra

आपको भारत में अनेक तीर्थों में अपनी वाणी पवित्र करने का सुयोग प्राप्त हुआ । हरिद्वार, ऋषिकेश, जगन्नाथपुरी, उज्जैन, काशी, बद्रीनाथ, रामेश्वरम्, वृन्दावन आदि अनेक तीर्थस्थलों में आपने अपने करुणाभाव को वाणी के माध्यम से गति दी है । न केवल भारत वसुन्धरा की पावन धरा पर, अपितु; सिंगापुर, मलेशिया, इण्डोनेशिया, थाईलैण्ड, यूरोप, पैरिस, मॉरिशस, ऑस्ट्रेलिया आदि देशों में भी आपने सनातन शास्त्रध्वज को फहराया । आपने श्रीमद्भागवत महापुराण, श्रीरामचरितमानस, श्रीशिवमहापुराण, देवी भागवत, श्रीहनुमान कथा, भक्तिमती मीरा चरित्र, नारदभक्तिसूत्र आदि विषयों पर चर्चा कर अपनी वाणी को पवित्र करते हुए भक्ति का प्रकाश जन-जन के हृदय तक पहुँचाया । एक बात जो मैंने बाहरी मिलने वाले व्यक्तियों से सुनी है कि आप धार्मिक समाजसेवी संस्थाओं, गौशालाओं या मानव सेवा में लगी संस्थाओं से स्वयं अपने लिए कोई मूल दक्षिणा नहीं लेते । यह एक अद्भुत एवं अनुकरणीय विचार लगा इसलिये मैंने इसका उल्लेख करना यहाँ उचित समझा । आप अपने कथा एवं प्रवचनों के माध्यम से भगवच्चरणारविन्द में सर्वात्म-समर्पण का भाव निरन्तर प्रवाहित करते रहते हैं । आपका जीवन भागवत प्रेम में समर्पित एक अत्यन्त सुन्दर यात्रा है तथा आप सबको एक अवसर देते हैं कुछ कदम उस यात्रा में सम्मिलित होने का…