उद्देश्य व परिकल्पना

वैदिक-यात्रा का मुख्य उद्देश्य मानवीय जीवन शैली में लगभग विलुप्त हो चुकी प्राचीन वेदशास्त्रसम्मत सनातन वैदिक संस्कृति व संस्कारों की पुर्नस्थापना करते हुए, उनका संरक्षण व संवर्धन करना है ।

एक सही कदम सही लक्ष्य की ओर ।
सनातन संस्कार और संस्कृति की नयी भोर ॥

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हमारी प्राचीन सनातन शास्त्र सम्मत संस्कृति व संस्कारों के अभाव में मानव जीवन पशुता की ओर जा रहा है । जब जीवन मनमुखी ढंग से चलता है तो वहाँ पशुता स्वयं आ जाती है और शास्त्रों के अनुसार चलने वाले जीवन में मानवता का दर्शन होता है । परमपूज्य श्री करपात्री जी महाराज प्रायः कहा करते थे –

मतयो यत्र गच्छन्ति तत्र गच्छन्ति वानराः ।
शास्त्राणि यत्र गच्छन्ति तत्र गच्छन्ति ते नराः ॥

श्रीमद्भगवद्गीता में ऐसे मनमाना आचरण करने वाले मनुष्यों को असुर कहा है –

प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च जना न विदुरासुरा: । ( गीता १६/०७ )

सनातन वैदिक शास्त्रों के अनुशीलन बिना मानव जीवन में मानवता का दर्शन सम्भव ही नहीं हैं । देखो, विश्व की प्राचीनतम संस्कृतियों में वैदिक, रोमन, ग्रीक और यूनानी संस्कृतियों का नाम आता है । रोमन, ग्रीक और यूनानी संस्कृतियांँ या तो लुप्तप्रायः हो गई है या कुछ अवशिष्ट भी हैं, तो उनमें अत्यधिक परिवर्तन आ गया है । परन्तु; भारतीय आर्यों की वैदिक सनातन संस्कृति आज भी यथावत् जीवित है, क्योंकि मानव समाज को आध्यत्मिक ऊर्जा, आत्मचिन्तन तथा जीवनधारा को सरल बनाने की क्षमता किंवा सामर्थ्य वैदिक सनातन संस्कृति में ही है । इसीलिए सूतसंहिता में भगवान् शिव स्वयं कहते हैं-

स्थापयध्वमिमं मार्गं प्रयत्नेनापि हे द्विजा: । स्थापिते वैदिके मार्गे सकलं सुस्थिरं भवेत् ॥
यश्च स्थापयितुं शक्तो नैव कुर्याद्विमोहित: । तस्य हन्ता न पापीयानिति वेदान्तनिर्णयः ॥
( सूतसंहिता )

सही मार्ग ही सही मंजिल तक पहुँचाता है और आध्यात्मिक दृष्टि से एवं आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी वैदिक मार्ग ही श्रेष्ठ व कल्याणकारी है । यही कारण है कि वैदिक-पौराणिक सनातन ग्रन्थों के ऊपर अब तक जापान, जर्मनी, अमेरिका, लंदन आदि देशों में, यहाँ तक कि वैज्ञानिक अनुसन्धान केन्द्र नासा के द्वारा भी अनेक शोध कार्य हुए हैं और वर्तमान में भी हो रहे हैं । परन्तु; वेद-पुराण शास्त्रों का ज्ञान, बिना सद्गुरु के प्राप्त नहीं हो सकता, फिर अप्राप्त ज्ञान का प्रयोग अर्थात् विज्ञान होना कैसे संभव है ?

बिनु गुरु होइ कि ग्यान ग्यान कि होइ विराग बिनु । गावहिं बेद पुरान सुख कि लहिअ हरि भगति बिनु ॥
कोउ विश्राम कि पाव तात सहज संतोष बिनु । चलै कि जल बिनु नाव कोटि जतन पचि पचि मरिअ ॥
( श्रीरामचरितमानस उ. का. ८९. सो )

वर्तमान युग में कुछ महनीय ब्रह्मविद्वरिष्ठ गुरुमुख का आश्रय लिए बिना ही अनादि अपौरुषेय वेद-पुराण शास्त्रों का कपोलकल्पित अर्थ करके आस्थावान् शान्त समाज में भी अशास्त्रीय बौद्धिक आतंक फ़ैलाने का कुप्रयास किया करते है ।

Vaidik Yatra

यदृच्छया श्रुतो मन्त्रश्छन्नेनाऽथ छलेन वा ।
पत्रेक्षितो वा व्यर्थः स्यात्प्रत्युतानर्थदो भवेत् ॥
(श्रुत प्रकाशिका )

वे अपने विचारानुसार शास्त्रों में जोड़-तोड़ का भी आपराधिक प्रयत्न कर बैठते हैं और शास्त्ररूपी परमात्मा को अधिकाङ्ग या हीनाङ्ग बनाने में ही अपने पाण्डित्य की श्रेष्ठता समझते हैं, यह अत्यन्त गलत परम्परा है ।

शास्त्रे न योजयेत्किञ्चिन्नकिञ्चित्खण्डयेन्नरः ।
हरेः शरीरवैकल्याज्जायते धर्मसंक्षयः ।।
(गोवंशमहिमामृतम्)

अतः इन्हीं आर्ष वेद-पुराण शास्त्रों के संरक्षण व संवर्धन हेतु प्राकृतिक वातावरण से सुसज्जित सुन्दर शान्त एकान्त विशाल भूमि में फल पुष्प वाले वृक्षों को अरोपितकर उसके बगल में हवा प्रकाश वाले मकान, विद्यार्थिओं को रहने के लिये शान्त एकान्त एक ऐसे वृहद् गुरुकुल के निर्माण की परिकल्पना है, जहाँ उन मकानों की बीच लगभग पाँच हज़ार विद्यार्थी बैठ सकें, इतना बड़ा हॉल बने एवं कदंब, आम्र, नीबू आदि वृक्षों के नीचे थोड़ी-थोड़ी दूरी पर वेद, धर्मशास्त्र, व्याकरण, न्याय, मीमांसा, योग, वेदांत, ज्योतिष, कर्मकाण्ड, आयुर्वेद, धनुर्वेद, गंधर्ववेद, मंत्रविद्या, रसायन शास्त्र, वनस्पतिशास्त्र, भूगर्मविद्या, खगोल विद्या, राजनीति तथा अर्थशास्त्र आदि विद्याएँ प्रयोग की साथ सिखाने वाले अध्यापकों को बैठने का प्रबंध हो ।

इस विराट हॉलके बगल में लगे हुए एक कमरे में धनुर्वेद, योगविद्या, मंत्रविद्या, रसायन शास्त्र, आयुर्वेद तथा ज्योतिष के प्रखर अभ्यासियों के संशोधन करने के लिये प्रयोगशाला हो । वह गुरुकुल, आधुनिक संसाधनों एवं वेद-पुराणों शास्त्रों पर ध्वनि, तरङ्गावृति आदि के आधार पर किये जाने वाले शोध के समुचित अत्याधुनिक उपकरणों से युक्त हो । साथ ही आर्षग्रंन्थों पर अनवरत शोधकार्य चलते रहें । जिससे उसका महत्व मानव मात्र को ज्ञात हो सके और वह उनके अनुसार अपना जीवन बड़ी प्रसन्नता के साथ संचालित करे । उसके बगल के एक कमरे में यज्ञशाला का प्रबंध हो और यज्ञशाला के निकट में पाठशाला और सबके बीचमें श्रीराधामाधव युगल विहारी सरकार का मंदिर हो । बाग़की एक तरफ गोशाला, दूसरी तरफ अध्यापकों के रहने की जगह, तीसरी तरफ आयुर्वेद का मुफ्त औषध देने वाला औषधालय और चौथी तरफ विद्यार्थियों को दंड-बैठक कुश्ती, पटाबाजी, लाठी, मुगदल आदि कसरत करने की रेती बिछाई हुई खुली जगह रखनी चहिये ।

जहाँ आध्यात्मिकता और आधुनिकता का अद्भुत सङ्गम हो एवं आर्ष ऋषि-गुरु परम्परानुसार वेद-पुराण शास्त्रों का यथार्थ मूलज्ञान पूर्ण तार्किक, परन्तु; विवादरहित व वैज्ञानिक पुष्टि के साथ कराया जाए ताकि समाज को इन आर्षग्रन्थों का महत्त्व पता चल सके और वह पूर्ण गौरव के साथ निःसंकोच इनके निर्देशन में जीवन-यात्रा करते हुए अपने चरम लक्ष्य को प्राप्त करें, क्योंकि जो प्राणी अधिकारी होते हुए भी वेदोक्त कर्मों का आचरण नहीं करते, वे अज्ञ एवं अजितेन्द्रिय रहते हुए विकर्म तथा अधर्म का शिकार होकर बार-बार मृत्यु अथवा असफलता को ही प्राप्त होते हैं ।

नाचरेद्यस्तु वेदोक्तं स्वयमज्ञोऽजितेन्द्रियः ।
विकर्मणा ह्यधर्मेण मृत्योर्मृत्युमुपैति सः ॥
( श्रीमद्भागवत महापुराण )

संक्षिप्त में, जितने भी आधुनिक परिवेष वाले व्यक्ति हैं, वह वर्तमान की प्रचलित भाषा आङ्ग्लभाषा के साथ-साथ धारा प्रवाह संस्कृत बोलने वाले हों और सांस्कृतिक वेशभूषा अर्थात् धोती-कुर्ता वाले सभी भाषाओं की जननी संस्कृत भाषा के साथ-साथ धारा-प्रवाह आङ्ग्लभाषा बोलने वाले हों, ताकि सभी अधिकारी मनुष्य शास्त्रों के सिद्धान्तों का वास्तविक अर्थ गुरमुख कर आधुनिक भाषा के प्रयोग द्वारा आचरण में लाते हुए जन-जन तक पहुँचा सकें । जिससे भारत वर्ष वास्तविकता में पूर्ववत् जगद्गुरु कहलाये और मानवमात्र शास्त्रचरण कर सच्ची मानवता को प्राप्त करते हुए, उनके चरम लक्ष्य को पा सके ।

साथ ही गुरुकुल में छात्रावास, ग्रन्थालय, अध्ययन कक्ष, क्रीडाङ्गन, आचार्य निवास, गौशाला, संध्या-सदनादि से सुसज्जित यज्ञशाला एवं अतिथि निवास हो, जहाँ प्रवेश करते ही मानसिक व शारीरिक शान्ति का अनुभव हो । साथ ही एक प्राण दो देह श्रीराधामाधव युगल विहारी का सुंदर मन्दिर हो, जहाँ अर्चोपासना की आध्यात्मिक ऊर्जा प्राप्त हो एवं आत्मिक उत्थान का मार्ग प्रशस्त हो । सम्भवतः भारत का यह पहला मन्दिर होगा, जहाँ एक प्राण दो देह श्रीराधामाधव का दिव्य विग्रह होगा ।

यह उद्देश्य व परिकल्पना श्रीयुगलविहारी सरकार की कृपा, पूज्य श्रीदादागुरुजी के आशीर्वाद एवं भगवान् विराट के स्वरुप ( आप सभी )की सहभागिता से शीघ्र पूर्ण हो जायगा । तब निःसंदेह स्वयं वेद भगवान् भी प्रसन्नता के साथ झूम उठेंगे एवं सनातन धर्म की ध्वजा सम्पूर्ण भारत में ही नहीं, अपितु; सम्पूर्ण विश्व में प्रसन्नता के साथ फहरेगी । तब निश्चित ही सनातन संस्कृति व संस्कारों की नयी भोर होगी ।

है उद्देश्य नहीं इस पथ का श्रान्त भवन में टिक जाना ।
किंतु पहुँचना उस मंजिल तक, जिसके आगे राह नहीं ॥

Vaidik Sutra