श्रीरामचरित मानस के प्रणेता: गोस्वामी श्रीतुलसीदास

श्रीरामचरित मानस के प्रणेता: गोस्वामी श्रीतुलसीदास

जीव और ईश का एक अनोखा जोड़ा है, जो कभी एक दूसरे से न अलग हुआ है और न कभी हो सकता है । अलग-अलग स्थावर-जंगम आदि शरीरों में रहने वाला ‘जीव’ और समष्टि-व्यष्टि रूप से कण-कण में व्यापक सबका मूल तत्त्व ‘ईश्वर’ है ।

जीव का परम पुरुषार्थ एक मात्र भगवत्प्रेम अर्थात् ईश्वर से प्रेम करना है । वेदों ने सांसारिक वस्तुओं का विश्लेषण करके उनकी अनित्यता, दु:खरूपता और मिथ्यात्व दिखलाकर उनसे प्रेम करने का निषेध और भगवान् के निर्गुण-सगुण स्वरूप की महिमा को गाकर उनसे प्रेम करने का विधान किया है । वह सब होने पर भी काल से माया-मोह में फँसे हुए जीव उस रूप में भगवान् की ओर अग्रसर नहीं हुए, जैसा होना चाहिए था । कुछ आगे बढ़े भी तो साधनों से पार पाना बहुत कठिन हो गया, इसमें कुछ विरले ही अपने वास्तविक गन्तव्य तक पहुँच सके ।

भगवान् को स्वयं अब इस बात की चिन्ता हो गयी कि यदि इसी तरह कुछ ही जीव मेरे प्रेम को प्राप्त कर सकेंगे, तब तो कल्पों में भी मेरे प्रेम को प्राप्त करने वालों की संख्या अगुँली पर गिनने के बराबर ही रहेगी । इसलिए अब मुझे स्वयं जीवों के बीच चलना अर्थात् प्रकट होना चाहिए और प्रकट होकर ऐसी लीलाएँ करनी चाहिए कि मेरे अन्तर्धान होने पर भी वे मेरे गुणों और लीलाओं का कीर्तन तथा श्रवण एवं स्मरण करके, मेरे सच्चे प्रेम को प्राप्त कर सकें ।

भगवान्, श्रीराम के रूप में अवतरित अर्थात् प्रकट हुए; उनके गुण, लीला-स्वरूप के कीर्तन, श्रवण, स्मरण की प्रेरणा भी आयी । अभी लीला, संवरण भी नहीं हो पायी थी कि महर्षि वाल्मीकि ने उन्हीं के पुत्र लव-कुश के द्वारा उनकी कीर्ति का गायन कराकर सुना दिया और भगवान् से उनकी यथार्थता की स्वीकृति भी करा ली । जगत में आदि कवि वाल्मीकि और आदि-काव्य हुआ वह दिव्य ग्रन्थ, जिसका नाम हुआ ‘रामायण’ । परन्तु; यह ग्रन्थ संस्कृत वाणी में था अत: उन्हें यह चिन्ता हुई कि आगे चलकर साधारण लोग संस्कृत से अनिभिज्ञ हो जायेंगे, तब वे इस रस का आस्वादन कैसे कर सकेंगे । उस बात की उन्हें चिन्ता हो गयी ।

श्रीवाल्मीकि की इस चिन्ता और उनके अनन्य भाव को श्रीहनुमान् जी महाराज ने भाँप लिया तथा उन्हें कलियुग में पुन: अवतार लेकर, श्रीराम के गुण तथा लीलाओं को सर्वसाधारण के लिए सुलभ कर देने की आज्ञा देते हुए, उनकी रक्षा करने का वचन दिया । श्रीवाल्मीकि जी ने उनकी आज्ञा को स्वीकारा तथा कलियुग में श्रीरामलीला का मधुर गान करने का वचन दिया । वे ही गोस्वामी श्रीतुलसीदास के रूप में प्रकट हुए ।

वाल्मीकिस्तुलसीदासः कलौ देवि भविष्यति ।
रामचन्द्रकथामेतां भाषाबद्धां करिष्यति ॥
( भविष्य पुराण .प्र.प. ४/२० )

त्रेता काब्य निबंध कियो सत कोटि रमायन ।
इक अच्छर उद्धरे ब्रह्महत्यादि परायन ॥
अब भक्तन सुख देन बहुरि लीला बिस्तारी ।
रामचरन रसमत्त रहत अहनिसि ब्रतधारी ।
संसार अपार के पार को सुगम रूप नौका लये ।
कलि कुटिल जीव निस्तारहित बाल्मीकि तुलसी भये ॥
श्रीभक्तमाल ( पद १२९ )

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Vaidik Sutra