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24 जनवरी
2021
वैदिक संस्कृति  और सदाचार

वैदिक संस्कृति सदाचार को जितना महत्व प्रदान करती है उतना अन्य उपादानोंको नहीं । चाहे हम अद्वैत को माने चाहे द्वैत को, यदि हम सदाचारी नहीं है तो मान्यता निरर्थक है – बालू में से तेल निकालने के समान है । और यदि हम सदाचारी है तो ईश्वर में विश्वास या अविश्वास का प्रश्न उठेगा

20 नवम्बर
2020
वेद ही सदाचारके मुख्य निर्णायक

वेद कहते हैं कि यदि कोई मनुष्य साङ्ग समग्र वेदोंमें पारंगत हो, पर यदि वह सदाचार सम्पन्न नहीं  है तो वेद उसकी रक्षा नहीं करेंगे । वेद दुराचारी मनुष्य का वैसे ही परित्याग कर देते हैं, जैसे पक्षादि सर्वाङ्गपूर्ण नवशक्ति सम्पन्न पक्षी-शावक अपने घोंसलेका परित्याग कर देते हैं । प्राचीन ऋषियों ने अपनी स्मृतियों में

9 अगस्त
2020
श्रीरामचरित मानस के प्रणेता: गोस्वामी श्रीतुलसीदास

जीव और ईश का एक अनोखा जोड़ा है, जो कभी एक दूसरे से न अलग हुआ है और न कभी हो सकता है । अलग-अलग स्थावर-जंगम आदि शरीरों में रहने वाला ‘जीव’ और समष्टि-व्यष्टि रूप से कण-कण में व्यापक सबका मूल तत्त्व ‘ईश्वर’ है । जीव का परम पुरुषार्थ एक मात्र भगवत्प्रेम अर्थात् ईश्वर से

20 जुलाई
2020
भजन करने की क्या अवस्था होनी चाहिए ?

प्रायः यह देखने या सुनने में आता है कि भगवान का भजन-स्मरण करना चाहिये । बात बिल्कुल ठीक है, पर फिर यह विचार भी आता है कि कब से करें ?? क्योंकि प्रायः लोगों के मन में यह भ्राँति होती है कि भगवान् का भजन-स्मरण अभी से क्या करना ? …….

27 जून
2020
सुख-शांति मिलती है “सत्कर्म” से कमाए हुए धन से

गृहस्थ लोग अपने पुरुषार्थ द्वारा परमात्मा की कृपा से धन बल का संचय कर सुख प्राप्त करें । धन शुचिता पूर्वक कमाना चाहिए जिसमें पवित्रता हो, बल हो लेकिन उस बल का प्रयोग किसी की रक्षा के लिए हो । ( अथर्ववेद ७/१७/१ )…..

6 अप्रैल
2020
मनुष्य जीवन की सार्थकता “आत्मज्ञान” में

आत्मज्ञान प्राप्त करना मानव जीवन का मूल लक्ष्य है । यह संसार कैसे बना ? पदार्थों का आदि कारण क्या है? शरीर और अस्थि, मांस और रक्त आदि की क्या विभिन्नता है और इन सब से आत्मा कैसे अलग है ? मनुष्य को इस सब का ज्ञान अवश्य प्राप्त करना चाहिए । ( ऋग्वेद १/१६४/४ ) …..

24 मार्च
2020
सन्मार्ग पर चलकर श्रेष्ठता पायें

अच्छे, बुरे सभी कर्म मनुष्य से ही होते हैं । दुर्बलता मनुष्य के लिए अज्ञानता का प्रतीक है । श्रेष्ठता प्राप्त करने के लिए आत्मबल प्राप्त करना चाहिए । यह तभी सम्भव है जब मनुष्य बुराइयों को त्यागकर सन्मार्ग पर चले । ( अथर्ववेद २/११/१ )…..

6 मार्च
2020
आत्मबल से मन को वश में करें

हमारे मन की शक्ति अनंत है ।वह सुप्त और जागृत अवस्था में भी हमेशा क्रियाशील रहता है । वह ज्योति स्वरूप है, समय व कुछ न कुछ सोचता और यहां-वहां भटकता रहता है । कभी भूतकाल की घटनाओं का चिंतन करता है और कभी भविष्य के कल्पनालोक में भ्रमण करता है । मन प्रतिक्षण किसी

31 जनवरी
2020
“परमात्मा” ही सांसारिक कष्टों से मुक्ति दिलाते हैं

विद्वान तथा बुद्धिमान लोग अपने ज्ञान से, चिंतन-मनन और अनुभव से यह जानते हैं कि हर पदार्थों में परमात्मा हैं। वही सम्पूर्ण जगत को आश्रय देता है। उसी से सारी सृष्टि प्रकट होती है । सभी प्राणी उसी से पैदा होते हैं और प्रलयकाल में उसी में विलीन हो जाते हैं । ( यजुर्वेद ३२/८

10 जनवरी
2020
पुरुषार्थ और परोपकार के मार्ग पर चलें

समुद्र को कामना नहीं होती फिर भी अनेक नदियां उसमें आकर मिलती हैं । इसी प्रकार उद्योगी पुरुषों के पास लक्ष्मी सदैव रहती हैं । अर्थात् जो व्यक्ति उद्योगी है, मेहनती है, पुरुषार्थ करता है उन्हें धन का अभाव कभी नहीं होता । कहा भी गया है ‘उद्यमेन हि सिद्धयन्ति कार्याणि न मनौरथैः । नहि