पाप का मूल है क्रोध

पाप का मूल है क्रोध

क्रोधी व्यक्ति हमसे सदैव वैसे ही दूर रहें जैसे पक्षियों को उड़ा देने से वे बहुत दूर चले जाते हैं क्योंकि क्रोधी व्यक्ति के पास रहने से स्वभाव उल्टा हो जाता है और धर्म की हानि होती है । ( ऋग्वेद १/२५/४ )

काम, क्रोध और लोभ आत्मा का नाश करने वाले तीन शरीर के शत्रु हैं जो व्यक्ति को नरक के द्वार का तक ले जाते हैं । इन तीनों में से क्रोध सबसे भयानक है । यह बहुत बुरी बला है और सभी बुराइयों और झगड़ों की जननी है । क्रोध उस बारूद के समान है जो दूसरों का नाश करने से पहले जिसमें यह रहता है उसे ही पहले भस्म कर देता है । क्रोध की अग्नि भी दूसरों को जलाने से पहले जहां उत्पन्न होती है, उसे ही जलाती है । क्रोध दूसरे को हानि पहुंचाने से पूर्व क्रोध करने वाले को ही जलाता है और कुरूप बना देता है । क्रोध में आंखें लाल हो जाती है, चेहरा भयंकर और विकराल हो जाता है । यह शरीर को जलाता है, हृदय को तपाता है, रक्त संचार को अनियमित कर देता है, व्याकुलता बढ़ाता है, वाणी को कठोर बनाता है और व्यक्ति को धर्म से दूर करता है । क्रोध से मनुष्य को धैर्य, विद्या ज्ञान और विवेक सब का नाश हो जाता है ।

क्रोध अहंकार के गर्भ से पैदा होता है जो मूढ़ता से बढ़ता है और पश्चाताप पर समाप्त होता है । यह मन में बुरे विचारों और भावों को जन्म देता है जिसके फलस्वरुप द्वेष, घृणा, वैमनस्य, दुःख, अभिमान आदि उत्पन्न होते हैं । क्रोध में मनुष्य माता, पिता, आचार्य संबंधियों आदि का अपमान कर बैठता है । क्रोधी मनुष्य दूसरों को दुःखी करता है या नहीं परन्तु; स्वयं अंदर ही अंदर जलता रहता है । इस भयंकर रोग से शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक अवनति होती है ।

क्रोध के साथ यदि विवेक का अंकुश रहे तो यह रामबाण औषधि का काम करता है, जिस प्रकार बहुत से रोगों के उपचार हेतु शांखिया तक दी जाती है । परिवार के सदस्यों, सहयोगियों तथा अधीनस्थों को सुधारने के लिए और बिगाड़ से बचाने के लिए क्रोध के विवेकपूर्ण प्रदर्शन की आवश्यकता होती है । इसके लिए दंड और प्रताड़ना की भी जरूरत पड़ती है । यदि इस स्थिति का त्याग कर दिया जाए तो फिर मां, बाप, अध्यापक और अधिकारी अपने कर्तव्यों का पालन अच्छे से नहीं कर पाएंगे । क्रोध का विवेकपूर्ण और व्यवहारिक प्रदर्शन वास्तव में प्रेमभाव का ही एक रूप है । इसके प्रयोग में बहुत संयम बरतना पड़ता है । क्रोध केवल दूसरों को आत्मसुधार की प्रेरणा देने के एक सशक्त साधन के रूप में ही प्रयुक्त होना चाहिए ।

क्रोध निवारण के कई उपाय हैं । मौन धारण करके इसे शांत कर सकते हैं । मौन रहकर मन ही मन में जाप करने से भी क्रोध का शमन हो जाता है । यदि किसी को गलती पर क्रोध आए तो यह ध्यान करना चाहिए कि ऐसी गलती मुझसे भी हो सकती है । इस प्रकार विवेक के अनुसार विचार करने से क्रोध का वेग कम हो जाता है । बार-बार अभ्यास करने से क्रोध पर विजय प्राप्त की जा सकता है ।

धैर्य और क्षमा का अभ्यास क्रोध के निवारण का सर्वोत्तम उपाय है । धैर्य, क्रोध को शांत कर देता है और क्षमा उसका समूल नाश कर देती है । व्यक्तिगत, पारिवारिक अथवा सामाजिक जीवन में यश और कीर्ति प्रदान करने के लिए क्रोध का त्याग करके हमें सभी से प्रेममय व्यवहार करना चाहिए । कहा भी गया है कि “क्रोध पाप का मूल है”, क्रोध ही पाप और सभी दुर्गुणों की जननी है । इसलिए क्रोध से बचें और राह में आए जो दीन, दुःखी, सबको गले से लगाते चलो, प्रेम की गंगा बहाते चलो ।

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Vaidik Sutra